পোস্টগুলি

মুক্তি ,ভক্তি ও ষড়রিপু এবং মানব জীবনে ষড়রিপুর প্রভাব:ষড়রিপু কে নিয়ন্ত্রণ বা দমন করার উপায়।

ছবি
जीव-स्वभावः धर्मः। शृणुत भक्तजनाः, एतत् सत्यं सनातनं वचनम्। स्वभावदोषो जीवस्य महाऽहितकरश्च महाऽमङ्गलम्। तस्य प्रतिकाराय जीवस्य स्वभावपरिवर्तनं प्रयोजनम्। तस्मात् सत्सङ्गः सद्गुरुसङ्गश्च परमं प्रयोजनम्। स्वभावपरिवर्तनं विना सर्वे कर्मधर्माः निष्फलाः। एवं देवतासङ्गः सत्सङ्गश्च स्वभावदोषेण विफलाः। জীব-স্বভাবঃ ধর্মঃ। শৃণুত ভক্তজনাঃ, এতত্ সত্যং সনাতনং বচনম্। স্বভাবদোষো জীবস্য মহাঅহিতকরশ্চ মহাঅমঙ্গলম্। তস্য প্রতিকারায় জীবস্য স্বভাবপরিবর্তনং প্রয়োজনম্। তস্মাত্ সত্সঙ্গঃ সদ্গুরুসঙ্গশ্চ পরমং প্রয়োজনম্। স্বভাবপরিবর্তনং বিনা সর্বে কর্মধর্মাঃ নিষ্ফলাঃ। এবং দেবতাসঙ্গঃ সত্সঙ্গশ্চ স্বভাবদোষেণ বিফলাঃ।  আত্মা–পরমাত্মা–শান্তি। যথা গৃহজীবো ভ্রমিত্বা স্বগৃহং প্রত্যাগত্য শান্তিমাপ্নোতি। তথৈবাত্মা পরমাত্মগৃহং প্রত্যাগত্য পরাং শান্তিমবাপ্নোতি॥ অত্রাপি আত্মা স্বং কর্তব্যং কর্ম ধর্মং আচরিতুম্ অর্হতি। পরন্তু পরমাত্মনি সমাহিতে আত্মনঃ অনন্ত শান্তিমাপ্নোতি॥ মানবদেহমহিমা জ্ঞানিনঃ মতিঃ — মানবদেহঃ মন্দিরসমঃ।   তস্য তৃষু দিশাসু অস্তি স্বর্গ মুক্তি মোক্ষদ্বারম্।   অন্যতোऽস্য অধোগতিঃ নরকোऽথ শ...

শ্রী শ্রী মা কালী এবং তাঁর বিভিন্ন রূপের বর্ণনা ও তাঁর ধ্যানমন্ত্র।

ছবি
महामाया-स्तोत्रम् ध्यानम् कालीं कृपामयीं देवीं, नीलोत्पलनिभां प्रभाम्। त्रिनेत्रां मुण्डमालां च, ध्यायामि जगदम्बिकाम्॥ स्तोत्रम् १. ब्रह्मशक्तिरूपा ब्रह्माणी, महेश्वरीति या स्मृता। निर्मलाकुमारिरूपा, महावज्रैन्द्री तथा॥ २. उग्रा शिवदूती नीला, मुण्डमालाविभूषिता। तमोमयी सा नियतिः, चण्डिका चान्यथा स्मृता॥ ३. अम्बिका वैष्णवी चापि, महागौरी च कौशिकी। कात्यायनी च कमला, भुवनेश्वरी ललिता॥ ४. दशमहाविद्यारूपा, काल्याख्या या प्रसिद्धिता। नमामि तां महादेवीं, सर्वरूपां जगद्गुरुम्॥ ५. साैवैकैव सन्त्येव, तथापि नान्यरूपिणी। अनन्तशक्तिसम्पन्ना, मायाशक्तिरनामया॥ ६. भक्तस्य हृदये नित्यं, नार्याः चाङ्के विराजते। ब्रह्मणो वाणीस्वरूपा, देवशक्तिर्निरूपिता॥ ७. भयत्रासहरां देवीं, भक्तानुग्रहकारिणीम्। जपमाला धरां नित्यं, त्राहि मां चण्डिकेश्वरीम्॥ ८. दुर्गां दुर्गतिनाशाय, कालिकां कालविग्रहम्। तारिणीं तारकत्राणां, त्राहि मां तारिणी शुभे॥ ९. नीलसरस्वतीं वन्दे, मातङ्गीं रूपधारिणीम्। धूमावतीं च बगला, मातरं मातृमण्डले॥ १०. भुवनेशि जगन्माते, महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते। कृपया पाहि मां नित्यं, मायामोहनिवारिणि...